Hindi quotes of love, life & relationship, Hindi Kahani (हिन्दी कहानी)
एक बार की बात है एक गाँव मे एक गरीब लकडहारा रहता था। एक दिन वह नदि के किनारे एक पेड की डाल को काट रहा था। अचानक उसके हाथ से कुल्हाडी गिर गयी। लकडहारे के पास केवल यही एक कुल्हाडी थी, इसलिए वह उसे खोजने के लिये नदी मे कूद गया। लेकिन वह उसे खोज ना सका क्योकिं पानी की तेज धारा उसे बहा ले गयी।
कुलहाडी ना मिलने की वजह से लकडहारा नदी के किनारे दुखी होकर बैठ गया और जोर-जोर से रोने लगा। लकडहारे के रोने की आवाज सुनकर, नदी की देवी प्रकट हुई। देवी ने पूछा, “लकडहारे, तुम क्यों रो रहे हो”?
लकडहारे ने रोते हुए बोला, “हे माँ। मेरी कुल्हाडी नदी में गिर गयी है। अब मैं लकडीयाँ नहीं काट पाउँगा और मै अपना और अपने परीवार का पालन-पोषण कैसे करुँगा”?
यह सुनकर नदी की देवी ने नदी मे डुबकी लगाया और एक सोने की कुल्हाडी लेकर नदी से बाहर आयी और नदी की देवी ने लकडहारे को बोला, “यह लो मैं तुम्हारी कुल्हाडी ले आयी”।
इस पर लकडहारे ने बोला, “नही देवी, यह मेरी कुल्हाडी नही है। मैं इसे नही ले सकता”।
यह सुनकर नदी की देवी ने दुबारा नदी में डुबकी लगाया। इस बार नदी की देवी एक चाँदी की कुल्हाडी के साथ बाहर आयी और लकडहारे से बोला, “यह लो तुम्हारी कुल्हाडी”।लेकीन इस बार भी लकडहारे ने उस कुल्हाडी को लेने से मना कर दिया और बोला यह मेरी कुल्हाडी नहीं है।
यह सुनकर नदी की देवी ने पुनः नदी में डुबकी लगाया और लकडहारे की लोहे की कुल्हाडी को हाथ मे लेकर बाहर निकली। देवी के हाथ में अपनी कुल्हाडी देखकर लकडहारा खुशी से झुम उठा और देवी से बोला, “धन्यबाद। आप ने मेरी कुल्हाडी को वापस ढुढ कर ला दिया, अब मैं अपने काम को दुबारा आसानी से कर पाउँगा”।
नदी देवी लकडहारे की ईमानदारी देखकर बहुत खुश हुई और उसे ईनाम के तौर पर सोने और चाँदी की कुल्हाडी भी दिया।
एक बार एक टोपी बेचने वाला गाँव में टोपी बेच रहा था। यह गर्मी का मौसम था इसलिए जल्द ही दिन गर्म हो गया। टोपी बेचनेवाले को रास्ते में एक छायादार पेंड मिला। वह उस पेंड के पास रुक गया और उसके निचे हि बैठ गया। उसने अपना दिन का खाना निकाला और खाया। उसके बाद उसने एक झपकी लेने के लिए सोचा। उसने रंगबिरंगे टोपियों से भरा अपना बैग अपने सर के निचे लगाया और सो गया।
जब टोपी बेचनेवाला पूरे निंद में सो रहा था उसी समय बन्दरों का एक झुण्ड उस पेंड के निचे आया। बन्दरों ने टोपीयों से भरा बैग टोपी बेचनेवाले के सर के निचे देखा तो उन्होनें उसे बडे उत्सुकता के साथ खोला।
बन्दरों ने बैग के अन्दर बहुत सारे रंगबिरंगे टोपी देखा। बन्दरों ने टोपीयों को आदमीयों के सर पर पहने हुए देखा था इसलिए उन्होने भी बैग से टोपीयाँ निकाली और अपने-अपने सर पर पहन ली। कुछ बन्दरों ने लाल पहना, कुछ ने पीला पहना तो कुछ ने चितकबरा रंग की टोपी पहन लिया।
उसके बाद सभी बन्दर टोपी पहनकर उस पेड के निचे चले गये जहाँ टोपी बेचने वाला सो रहा था। कुछ देर बाद टोपी बेचने वाला निंद से जग गया। उसने पाया कि बैगों से भरा उसका थैला खाली था। उसने कुछ शोरगुल सुना और पेंड की तरफ उपर देखा। उसने देखा की सारे बन्दर टोपीयों को पहनने में व्यस्त है। यह देखकर टोपी बेचने वाला बहुत गुस्सा हो गया और बन्दरों को मारने के लिए अपनी मुट्ठी दिखाया। बन्दरों ने इसे देखकर नकल किया और उन्होंन भी मुट्ठी टोपी बेचनेवाले को दिखाया। फिर टोपी बेचनेवाले ने गुस्से में जोर से अपने पैर को जमीन पर पटका। इसे देखकर बन्दरों ने भी जोर से अपने पैर को पेड की डाली पर पटका। यह देखकर टोपी बेचनेवाले ने सोचा कि बन्दर तो मेरी नकल कर रहे है। इसलिए टोपी बेचनेवाले ने बहुत गुस्से में सर से अपनी टोपी को निकाला और जमीन पर फेक दिया। नकलची बन्दरों ने भी उसकी नकल की और अपनी-अपनी टोपी को सर से निकालकर जमीन पर फेंक दिया। टोपी बेचनेवाले ने फटाफट अपनी टोपीयों को इकट्ठी कीया और वहाँ से भाग गया।
एक बार एक मूर्ति बनाने वाले ने दशहारा के समय बहुत भगवान की बहुत बडी मूर्ति बनाया। इस मुर्ति को उसे एक धनी व्यापारी के घर लेजाकर देना था। चूकीं मुर्ति बहुत बडि थी, इसलिए वह उसे खुद लेकर नही जा सकाता था। इसलिए उसने एक गधे को किराये पर लिया ताकि वह उसे व्यापारी के घर पहुँचा सके। उसने मुर्ति को गधे के पीठ पर लाद दिया और उसे लेकर चल पडा। रास्ते में बहुत सारे लोगों ने गधे की पीठ पर भगवान की मूर्ति को देखा। इनमें से बहुत सारे लोग धार्मिक स्वभाव के थे जो भगवान की मूर्ति को देखकर उसे सिर झुकाकर नमस्कार कर रहे थे। उसमें से कुछ लोग रुककर मूर्ति बनाने वाले के कला की प्रशंसा कर रहे थे।
यह सब देखकर गधे ने सोचा की लोग उसे सिर झुकाकर नमस्कार कर रहे है। और यह सोचकर गधा मन ही मन बहुत खुश हो रहा था और इसी घमण्ड और खुशी में गधा जोर-जोर से चिल्लाने लगा। यह देखकर मुर्तिकार ने उसे प्यार से बोला की तुम चिल्लाना बन्द कर दो लेकिन गधा नही माना और चिल्लाता ही रहा और गधा अब ठुमक-ठुमक कर चलने लगा। यह सब देखकर मूर्तिकार डर गया और उसने सोचा की गधा कही मूर्ति गिरा ना दे। यह देखकर मूर्तिकार गुस्से हो गया और डण्डा उठाया और गधे को जोर से दे मारा। डण्डा से मार पडने के बाद गधे को होश आया और वह अपना झुठा घमण्ड भूल गया और सही तरीके से चलने लगा।
रामू और राजू बचपन के दोस्त थे। एक बार दोनों ने फैसाला किया कि वे पास के शहर में जायेगे और कुछ काम करेंगे। वे दोनों अगले दिन शहर के लिए निकल पडे।शहर जाने वाले रास्ते में एक घना जंगल पडता था। वे दोनों जब उस घने जंगल से होकर जा रहे थे तो उन्होनों ने देखा कि एक बडा सा भालू उनकी तरफ आ रहा है। वह भालू गूस्से में और भूखा लग रहा था।
यह देखकर रामू भागा और एक पेड पर चढ गया। रामू यह भूल गया कि उसके दोस्त राजू को पेड पर चढना नही आता है। रामू तो पेड की उँची डाली पर चढकर बैठ गया था और वह अपने आप को सुरक्षित महसुस कर रहा था लेकिन राजू की जिंन्दगी खतरे मे पड गयी थी। राजू रामू को मदद करने के लिए बुलाता रहा लेकिन रामू ने पेड पर चढने में उसकी सहायता नही की।जल्दी ही राजू ने देखा की भालू उसकी तरफ आ रहा है। उसे कुछ भी सुझ नही रहा था कि वह क्या करे। उसे ऐसा लग रहा था अब भालू उसे जरुर ही मारकर खा जायेगा।
अचानक राजू के दिमाग मे एक विचार आया। उसने सुना था कि भालू मरे हुए आदमियों को नही खाते है। इसलिए वह जमीन पर लेट गया और थोडा भी हील-डुल नही रहा था। भालू राजू के पास आया और उसे सुघने लगा। राजू ने अपने साँस को एकदम रोक रखा था ताकि भालू को ऐसा लगें की आदमी मरा हुआ है।
भालू ने राजू को सुघाँ और उसे मरा हुआ समझकर वहाँ से चला गया। जब भालू चला गया तो रामू पेड से निचे उतरा और राजू से पूछा, “भालू ने तुम्हारे कान में धीरे से क्या कहा”?
इसपर राजू ने कहा, “भालू ने कहा की तुम्हारे जैसे धोखेबाज दोस्तों से बचकर रहे”।